कहा से शुरुवात करूँ
कहा से शुरुवात करूँ कुछ समझ में नहीं आता क्योंकि मेरी शुरुआत ही गलत थी , शुरुआत ही क्या मैं ही गकत था जो तुमसे प्यार कर बैठा .
कितनी बार तुमसे कहना चाहा पर कहने से डरता था , कहीं हमारी दोस्ती न टूट जाए . बस यही डर लगा रहता था कि तुम मेरी नहीं हुई तो क्या होगा मेरा . पर ये हो न सका , हमारी दोस्ती भी नहीं रही.
कितनी बार तुमसे कहना चाहा पर कहने से डरता था , कहीं हमारी दोस्ती न टूट जाए . बस यही डर लगा रहता था कि तुम मेरी नहीं हुई तो क्या होगा मेरा . पर ये हो न सका , हमारी दोस्ती भी नहीं रही.
जो सोचा था वो हो न सका , वैसे भी सोचे हुए बात कहां पुरे होते हैं .
आज मैं तुम्हारे लिए इतना अंजान हो गया कि तुम मुझे देखना भी नहीं चाहती . चलो अच्छा है कोई तो है जो मुझे इतनी नफरत करता है , जिसे मैंने प्यार किया उसी ने मुझसे मुंह मोड़ लिए इससे बड़ी बात मेरी लिए क्या हो सकती है.
सुक्रिया आपका , आपकी वजह से मेरी जिंदगी ने मुझे जीना सिखा दिया …
पर अब मैं जियूं तो किसके लिए ? एक सहारा था आपकी दोस्ती का , पर हम इस काबिल ही कहां जो आपसे दोस्ती का साथ निभा सके .
दिल रोया था , टूट भी गया था जब आपने हमे एक खुबसूरत तौफा दिया अपनी जुदाई का .
इसके लिए हम आपके सुक्रगुजर है . मैंने अपने दिल को समझा लिए , पर मेरा दिल है की मानने को तैयार ही नहीं , उसे तो बस आपके फिर लौट आने का आज भी इंतजार है , पर इस कम्बक्त दिल को कौन समझाए कि आप ने तो मुझे अपना सब कुछ दे दिया प्यार के सिवा .
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